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RBI Monetary Policy 2022 in Hindi: रिज़र्व बैंक ने रेपो रेट में की बढ़ोतरी, रेपो रेट बढ़कर हुआ 6.25%

RBI Monetary Policy 2022: भारतीय रिज़र्व बैंक के वर्तमान गवर्नर (RBI Governor) शक्तिकांत दास (Shaktikanta Das) ने तीन दिनों तक चली मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) की बैठक के बाद रेपो रेट दर बढ़ाने का घोषणा की है. आरबीआई ने रेपो रेट में 0.35% वृद्धि करने की घोषणा की है. अब आरबीआई की रेपो रेट 5.4% से बढ़कर 6.25% हो गई है. इससे पहले आरबीआई ने अक्टूबर और अगस्त में भी रेपो रेट में 50 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की थी. मई महीने में भी हुई एमपीसी की बैठक में रेपो रेट को 50 बेसिस प्वाइंट बढ़ाकर 4.90% कर दिया गया था.

 

RBI Monetary Policy 2022: आरबीआई गवर्नर ने क्या कहा?

आरबीआई गवर्नर ने रेपो रेट की बढ़ोतरी की घोषणा करते हुए  यह भी कहा कि अगले चार महीनों में महंगाई दर चार प्रतिशत से ऊपर बने रहने की संभावना है। एमपीसी के छह सदस्यों में से पांच ने रेपो रेट बढ़ाने के फैसले का समर्थन किया है। आरबीआई गवर्नर ने रेपो रेट की घोषणा करते हुए यह भी कहा है कि देश में ग्रामीण मांग में सुधार दिख रहा है। आरबीआई गवर्नर ने कहा है कि वित्तीय वर्ष 2023 में जीडीपी ग्रोथ 6.8% रह सकता है। आरबीआई गवर्नर ने यह भी कहा है कि वत्तीय वर्ष 2024 की पहली तिमाही में सीपीआई 5% रह सकती है।

 

RBI Monetary Policy 2022: नतीजतन, विभिन्न दरें निम्नानुसार हैं

  • रेपो दर: 6.25% (बदला हुआ)
  • स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ): 6.00% (परिवर्तित)
  • सीमांत स्थायी सुविधा दर: 6.50% (बदला हुआ)
  • बैंक दर: 6.15%
  • फिक्स्ड रिवर्स रेपो रेट: 3.35%
  • नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर): 4.50%
  • वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर): 18.00%

 

RBI Monetary Policy 2022: तीन दिवसीय बैठक

विशेषज्ञों के अनुसार खुदरा मुद्रास्फीति में नरमी के संकेत और वृद्धि को आगे बढ़ाने की आवश्यकता के बीच रिजर्व बैंक अपनी आने वाली मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट में 35 बीपीएस की वृद्धि का विकल्प चुना है। बता दें कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) शुरू हुई मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की तीन दिवसीय बैठक के बाद सात दिसंबर (बुधवार) को अपनी अगली द्विमासिक नीति पेश की है।

 

मौद्रिक नीति समिति की संरचना इस प्रकार है:

  • भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर – अध्यक्ष, पदेन: श्री शक्तिकांत दास
  • भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर, मौद्रिक नीति के प्रभारी- सदस्य, पदेन: डॉ माइकल देवव्रत पात्रा
  • भारतीय रिजर्व बैंक के एक अधिकारी को केंद्रीय बोर्ड द्वारा नामित किया जाएगा – सदस्य, पदेन: डॉ मृदुल के सागर
  • मुंबई स्थित इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंटल रिसर्च में प्रोफेसर: प्रो आशिमा गोयल
  • अहमदाबाद में भारतीय प्रबंधन संस्थान में वित्त के प्रोफेसर: प्रो. जयंत आर वर्मा
  • एक कृषि अर्थशास्त्री और नई दिल्ली में नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के वरिष्ठ सलाहकार: डॉ शशांक भिड़े.

 

RBI Monetary Policy 2022: रेपो रेट क्या है?

रेपो रेट वह दर होती है जिस पर बैंकों को आरबीआई कर्ज देता है। बैंक इस कर्ज से ग्राहकों को ऋण देते हैं। बैंक इस चार्ज से अपने ग्राहकों को लोन प्रदान करता है। रेपो रेट कम होने का अर्थ है कि ग्राहक अब कम दामों में भी होम लोन और व्हीकल लोन जैसे लोन के कर्ज के दर सस्ते हो जाएंगे।

 

RBI Monetary Policy 2022: मौद्रिक नीति के अन्य महत्वपूर्ण उपकरण:

आरबीआई की मौद्रिक नीति में कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष साधन हैं जिनका उपयोग मौद्रिक नीति को लागू करने के लिए किया जाता है। मौद्रिक नीति के कुछ महत्वपूर्ण उपकरण इस प्रकार हैं:

  • रेपो दर: यह (फिक्स्ड) ब्याज दर है, जिस पर बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक से तरलता समायोजन सुविधा (एलएएफ) के तहत सरकार और अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियों की संपार्श्विक के खिलाफ रातोंरात तरलता उधार ले सकते हैं.
  • रिवर्स रेपो दर: यह (फिक्स्ड) ब्याज दर है, जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक एलएएफ के तहत पात्र सरकारी प्रतिभूतियों की संपार्श्विकता के खिलाफ रातोंरात बैंकों से तरलता को अवशोषित कर सकता है.
  • चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ): एलएएफ की रातोंरात और साथ ही इसके अंतर्गत सावधि रिपो नीलामियां हैं. रेपो शब्द इंटर-बैंक टर्म मनी मार्केट के विकास में मदद करता है. यह बाजार ऋण और जमा के मूल्य निर्धारण के लिए मानक निर्धारित करता है. यह मौद्रिक नीति के प्रसारण को बेहतर बनाने में मदद करता है. विकसित बाजार की स्थितियों के अनुसार, भारतीय रिज़र्व बैंक परिवर्तनीय ब्याज दर रिवर्स रेपो नीलामी भी करता है.
  • सीमांत स्थायी सुविधा (MSF): MSF एक प्रावधान है जो अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को भारतीय रिजर्व बैंक से रातोंरात अतिरिक्त धनराशि उधार लेने में सक्षम बनाता है. बैंक अपने वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) पोर्टफोलियो में ब्याज की दंड दर तक सीमित करके ऐसा कर सकते हैं. इससे बैंकों को उनके द्वारा सामना किए गए अप्रत्याशित तरलता झटके को बनाए रखने में मदद मिलती है.

 

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