झारखंड की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। राज्य के लगभग 7500 सरकारी विद्यालय ऐसे हैं जहां पूरा स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहा है, जबकि प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में शिक्षकों के करीब 50 हजार पद अभी भी रिक्त हैं। यह स्थिति न केवल शिक्षा विभाग के लिए चुनौती बन चुकी है, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
हाल ही में आयोजित सहायक आचार्य भर्ती परीक्षा से उम्मीद थी कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी काफी हद तक दूर हो जाएगी, लेकिन परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भर्ती के लिए आयोजित परीक्षा में बड़ी संख्या में अभ्यर्थी शामिल हुए, लेकिन योग्य उम्मीदवारों की संख्या रिक्त पदों की तुलना में काफी कम रही।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर राज्य में शिक्षक बनने के लिए योग्य उम्मीदवार क्यों नहीं मिल पा रहे हैं और शिक्षा व्यवस्था को इस संकट से बाहर कैसे निकाला जाएगा?
क्या है पूरा मामला?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, झारखंड में प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में लगभग 50,000 शिक्षक पद खाली हैं। इन रिक्तियों को भरने के लिए राज्य सरकार ने 26,000 सहायक आचार्य पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी।
भर्ती परीक्षा में करीब 11,300 अभ्यर्थी सफल हुए, जिनमें लगभग 7,301 अभ्यर्थी सीधे शिक्षक पद के लिए योग्य पाए गए, जबकि दूसरे चरण में केवल 3,999 उम्मीदवार ही सफल हो सके। यह संख्या उपलब्ध रिक्तियों की तुलना में काफी कम है।

क्यों नहीं भर पा रहे शिक्षक पद?
शिक्षक भर्ती विशेषज्ञों और रिपोर्ट्स के अनुसार कई कारण सामने आए हैं:
- शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) में पर्याप्त उम्मीदवार सफल नहीं हो पा रहे हैं।
- लंबे समय तक भर्ती प्रक्रिया नहीं होने से योग्य उम्मीदवारों की संख्या प्रभावित हुई।
- आरक्षण नियमों और विषयवार सीटों के कारण कई पद खाली रह जाते हैं।
- भर्ती प्रक्रिया से जुड़े कानूनी विवाद और नॉर्मलाइजेशन जैसे मुद्दों ने भी नियुक्तियों को प्रभावित किया है।
- ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में नियुक्ति को लेकर उम्मीदवारों की रुचि अपेक्षाकृत कम रहती है।
छात्रों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ रहा है?
एक शिक्षक वाले स्कूलों में कक्षा 1 से 5 या उससे अधिक कक्षाओं को एक ही शिक्षक संभालता है। इससे:
- सभी विषयों की नियमित पढ़ाई प्रभावित होती है।
- विद्यार्थियों को व्यक्तिगत मार्गदर्शन नहीं मिल पाता।
- सीखने की गुणवत्ता पर असर पड़ता है।
- सरकारी स्कूलों में नामांकन और परिणाम दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द बड़े स्तर पर शिक्षक नियुक्तियां नहीं हुईं तो आने वाले वर्षों में सरकारी शिक्षा व्यवस्था और दबाव में आ सकती है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती
राज्य सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक ओर रिक्त पदों को भरना और दूसरी ओर पर्याप्त संख्या में योग्य अभ्यर्थी तैयार करना। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया को नियमित बनाने, शिक्षक प्रशिक्षण को मजबूत करने और पात्रता परीक्षाओं की गुणवत्ता सुधारने की जरूरत है।








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