डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी—एक ऐसा नाम, जिसने भारत के इतिहास में महिलाओं के अधिकार, शिक्षा और स्वास्थ्य को नई दिशा दी। तमिलनाडु के पुदुक्कोट्टई जिले में 1886 में जन्मी रेड्डी सिर्फ देश की पहली महिला विधायक ही नहीं, बल्कि पहली भारतीय महिला सर्जन भी बन गई थीं।
उन्होंने समाज के लिए वो मुकाम हासिल किया, जो उस समय एक लड़की के लिए कल्पना से परे था। स्कूली शिक्षा में भी लड़कियों की हिस्सेदारी कम थी, लेकिन उन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेकर इतिहास रच दिया.
बतौर सर्जन और शिक्षक उन्होंने महिलाओं को डॉक्टर बनने और आत्मनिर्भर होने के लिए प्रेरित किया। वर्ष 1912 में देश की पहली महिला डॉक्टर बनीं और मद्रास के सरकारी अस्पताल में पहली हाउस सर्जन महिला के रूप में सेवा की। उनकी शादी डॉ. डी. टी. सांडारा रेड्डी से हुई, जिन्होंने हर चुनौती में उनका साथ दिया।
रेड्डी का असली सामाजिक योगदान तब नजर आया जब उन्होंने चिकित्सा पद्धति छोड़कर राजनीति और समाजसुधार के क्षेत्र में कदम रखा। 1927 में वे मद्रास विधान परिषद की पहली महिला विधायक बनीं, उन्होंने ‘देवदासी प्रथा’ और ‘बाल-विवाह’ जैसी कुरीतियों के खिलाफ निर्णायक अभियान चलाया।
1931 में ‘अव्वाई होम’ की स्थापना की—जो अनाथ और उपेक्षित लड़कियों के संरक्षण और शिक्षा का केंद्र बना। महिलाओं और बच्चों के लिए अस्पताल और कानूनी अधिकारों के लिए उन्होंने कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित करवाए.
1954 में चेन्नई में ‘अडयार कैंसर संस्थान’ (Adyar Cancer Institute) की स्थापना उनके सेवा समर्पण का प्रतीक है, जो हर साल करीब 80,000 मरीजों का इलाज करता है। 1956 में देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से नवाजा गया। तमिलनाडु सरकार ने हर साल उनकी जयंती (30 जुलाई) को ‘अस्पताल दिवस’ (Hospital Day) के रूप में मनाना शुरू किया।
महिला कल्याण के उनके कार्यों ने लाखों लोगों की जिंदगी बदली। 1968 में 81 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ, लेकिन आज भी उनकी नीतियाँ और जज़्बा महिलाओं को आगे बढ़ने की हिम्मत देता है.








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