How diesel and petrol prices increase and decrease: डीजल और पेट्रोल की कीमतें उछाल या गिरावट आते ही हर बार यह एक चर्चा का विषय बन जाता है। ऐसा तेजी से दिनों-दिन बढ़ती गाड़ियों की संख्या और इससे गाडी मालिकों पर सीधे तौर पर पड़ने वाले प्रभाव के कारण होता है। इसके अलावा, जब कीमतें बढ़ती हैं, तो लगभग सभी सार्वजनिक परिवहन के किराए में भी वृद्धि होती है, जिससे सीधे तौर पर यात्रा करने वाले आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़ता है।
जब भी कीमतें में उछाल आता हैं, तो इस पर देश की मौजूदा सरकार के बारे में बहुत सारे विवाद और बहस होती है। लेकिन हमारे लिए यह जानना बहुत जरुरी है कि डीजल और पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि या कमी का वास्तविक कारण क्या हैं? इसलिए Adda247 आज यहां डीजल और पेट्रोल की कीमत में वृद्धि और कमी के लिए जिम्मेदार कुछ घटक लेकर आया है, जो डीजल और पेट्रोल की कीमत निर्धारित करने अहम भूमिका निभाते हैं।
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कच्चे तेल की कीमतें
डीजल और पेट्रोल के दाम बढ़ने और घटने का सबसे बड़ा और पहला कारण कच्चे तेल की कीमतें है। दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमत कच्चे तेल की मांग और आपूर्ति पर निर्भर करती है। कच्चे तेल से बने पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती मांग के लिए काफी हद तक विश्व आर्थिक स्थिति जिम्मेदार है। इसलिए, जब भी पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ती या घटती हैं, तो इसके पीछे कच्चे तेल की लागत की प्रमुख भूमिका होती है।
डिस्टिलेट फ्यूल डिमांड
पेट्रोल और डीजल की कीमत में वृद्धि और कमी आसुत ईंधन (distillate fuel) की अंतर्राष्ट्रीय मांग पर भी निर्भर करती है। आसुत ईंधन (distillate fuel) क्या हैं? ये मुख्य रूप से डीजल फ्यूल और अन्य हीटिंग आयल होता हैं। इस तरह के distillate fuel की मांग एक राष्ट्र से दूसरे की अलग होती है। उदाहरण के लिए, यूरोपीय देश अमेरिका की तुलना में आसुत ईंधन पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं। यह मांग कई कारकों पर निर्भर करती है जैसे वाहनों की बढ़ती संख्या, उपयोग में वाहनों का प्रकार और इसी तरह भारत और चीन जैसे देशों में लगातार सड़क पर वाहनों की संख्या में वृद्धि हो रही हैं और इसलिए आसुत ईंधन की मांग बढ़ती जा रही है जो जिससे डीजल और पेट्रोल की कीमतों में उछाल आता है। दूसरी ओर, अमेरिका जैसे कई देश हैं जो कुछ हद तक इलेक्ट्रिक वाहनों का विकल्प पेश कर रहे हैं जो जिससे ईंधन की मांग कम हो जाएगी।
जनरल डिमांड एंड सप्लाई थ्योरी
अंतरराष्ट्रीय कारणों के अलावा, देश के भीतर सामान्य आर्थिक कारक की मांग और आपूर्ति भी पेट्रोल और डीजल की कीमत में उतार-चढ़ाव का कारण बनती है। क्योंकि जब तेल का स्टॉक कम होना शुरू हो जाता है, लेकिन मांग में कमी नही आती है, तो कई थोक आपूर्तिकर्ता उस मूल्य को बढ़ा देते हैं जिससे पेट्रोल की कीमत में वृद्धि होती है। फिर, इसके विपरीत ऐसा तब भी होता है जब ईंधन की आपूर्ति देश में मांग की तुलना में बहुत अधिक हो जाती है। इस तरह के उतार-चढ़ाव लगभग सभी कमोडिटी बाजारों में होते हैं और जो एक सामान्य सिद्धांत है। इस तरह कच्चे तेल के लिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मांग और आपूर्ति के अलावा, देश में पेट्रोलियम उत्पादों की मांग और आपूर्ति कारक भी इन उत्पादों की कीमत तय करते हैं।
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लगाया गया टैक्स और अन्य लागत
आम जनता द्वारा जो पेट्रोल और डीजल की कीमतें अदा की जाती है उसमें ईंधन की वास्तविक लागत के अलावा कई अन्य चीजें भी शामिल होती हैं। इसमें वह टैक्स भी शामिल होता है जो भारत जैसे देशों में केंद्र सरकार द्वारा तेल पर लगाया गया है। अमेरिका जैसे कुछ अन्य देशों में, परिवहन लागत को पेट्रोल और डीजल की कीमत के साथ भी जोड़ा जाता है जिसे उपभोक्ता को अंत में भुगतान करना पड़ता है। इस प्रकार, जब भी कोई उपभोक्ता पेट्रोल या डीजल का भुगतान करता है, तो वह न केवल पेट्रोलियम पदार्थ की नेट लागत देता है, बल्कि उस पर लगाए गए अन्य लागतों की संख्या भी देता है।
पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत अलग-अलग देशों की केंद्र सरकार द्वारा अलग-अलग तरीकों से निर्धारित की जाती है। उदाहरण के लिए, वर्ष 2017 से पहले, पेट्रोल और डीजल की कीमत को दो सप्ताह के लिए निर्धारित किया जाता था। लेकिन 16 जून 2017 के बाद से, यह प्रक्रिया बदल गई और अब कीमतों को दैनिक आधार पर बदला जाता है। देश में इस मेथड का इस्तेमाल खुदरा मूल्य अस्थिरता को कम करने के लिए किया गया था। इसके अतिरिक्त, इसे उपभोक्ताओं को हर बार कीमत में एक दम से आने वाले उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए ऐसा किया गया था।
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