20/06/2017

India vs Pak: Lessons & Learning

 प्रिय पाठको,


कुछ के लिए दिल तोड़ने वाला क्षण था 
कुछ के लिए यह एक भयानक हार थी
कुछ के लिए यह असहनीय क्षण था 
कुछ के लिए यह अस्वीकार्य क्षण था 
कुछ के लिए उनके सभी सपने तोड़ने वाला क्षण था.


हां, यह सब कल रात हुआ था और यह सभी देशवासियों की भावनाओं पर आधात था इस आधात से वह जो केवल बाहर से शांत दिख रहे थे लेकिन अंदर से भावनाओ के उन्माद पर थे. यह दिन भारतीय टीम के लिए बहुत कठिन था और वह दबाब को सहन नहीं कर पायें. पर कुछ के लिए अंधकारमय रात थी, और इस रात ने जीवन के कुछ बेहद कठिन सीख दी. वह व्यक्ति जो अपनी गलतियों से सीखते है और और उसमे सुधार करते है और उस कार्य में बेहतर बदलावों को लागू करते है. हां आपने सही समझा. ये लोग कोई असाधारण व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन यह त्वरित शिक्षार्थी हैं और तेजी से वापसी करते है. वह ऐसे उम्मीदवार हैं जो अपने साथियों से हमेशा आगे निकलने की तैयारी के मामले में ही नहीं बल्कि स्वभाव और सीखने की क्षमताओं के संदर्भ में भी आगे निकलने के प्रयास करते हैं. वह विफलताओं को सिखने के लिए सुनहरे मौके के रूप में स्वीकार करते हैं जिसका लाभ उन्हें भविष्य में होता है. आइये देखते हैं कि भारतीय टीम की कल की गलती से क्या सीख मिलती  है.

यह एक और सामान्य दिन था जहां एक टीम ने दूसरे को पराजित किया, लेकिन अगर आप बारीकी से विश्लेषण करते हैं, टॉस के अंत में भारत की हार की पटकथा पहले से ही लिखी गई थी. टॉस से हमे यह सिखाना है कि कभी भी अधिक-आत्मविश्वास नहीं होना चाहिए. यह एक हलकी भूरी घास के साथ एक सपाट सतह थी. यह ऐसी सतह थी  जहाँ हर खिलाड़ी पहले बल्लेबाजी करना चाहता है. अब अधिक आत्मविश्वास के कारण भारतीय कप्तान ने पहले गेंदबाजी करने का फैसला किया. इसलिए तथ्य के बारे में जाने बिना और वह अपने पीछा-करने के कौशल पर विश्वास होने के कारण तथा पिछली जीत ने भी स्कोर का पीछा करने के फैसले को बल दिया. इसलिए, यह निर्णय पूरी टीम और पूरे देश के लिए घातक साबित हुआ. इस फैसले की ही तरह कभी-कभी हम निश्चित विषयों के बारे में भी अधिक-आत्मविश्वासी हो जाते है और परीक्षाओं में बड़ी भूल कर बैठते हैं. अधिक आत्मविश्वास की खुराक से बचना चाहिए और हमें एक गिलास की तरह व्यवहार करना चाहिए जो हमेशा ज्ञान से भरने के लिए तैयार हो. हालांकि, यह पूरी तरह से आप पर निर्भर करता है कि आपको क्या चुनना है और क्या नहीं चुनना है. जो हमेशा पूर्ण भरा होता है वह कभी ज्ञान की तलाश नहीं करेगा और जो कभी ज्ञान की तलाश नहीं करता है वह कभी बुद्धिमान नहीं बन सकता है.


दूसरी गलती जो भारत के लिए घातक साबित हुई, वह बूमरा की नो बॉल थी. यदि ये नो बॉल न होती तो स्थित कुछ और होती.  जैसाकि फखर ज़मान ने अपनी गलती से सीखा और ऑफ़ स्टम्प से बहार जाती गेंद को फिर से नहीं छेड़ा और अंत में सर्वश्रेष्ट प्रदर्शन किया और अपना पहला शतक भी लगाया. इसी तरह यह नो-बॉल एक पजल है और बेहद कठिन प्रश्न/ अंग्रेजी आरसी की तरह है, जिसे परीक्षा में जानबूझकर जोड़कर कई उम्मीदवारों को परीक्षा को गलती करने को परेशान किया जाता है जो परीक्षा के शुरुआती चरणों में दबाव में डालती हैं. क्या आपने कभी सोचा है कि ये कठिन प्रश्न शुरु में क्यों दिए जाते हैं? सरल है, आपका बेहतरीन प्रदर्शन पाने के लिए और आपको विचलित करने के लिए ताकि आप बिना किसी कठिन लड़ाई के परीक्षा के सामने आत्मसमर्पण कर दें. इससे उनका कार्य आसान हो जाता है. इसलिए, एक नो बॉल पर अटक मत जाओ क्योकि यह आपके पुरे मैच को नष्ट कर सकता है. दूसरे शब्दों में, नो-बॉल पर आप निराश हो सकते हैं और असफल हो सकते हैं. तो, उन्हें अच्छी तरह से पहचानें. उन सवालों पर चलो, जो आसान होते हैं, लेकिन आप से छिपाए गए हैं.

तीसरा और भारत की ओर से सबसे बड़ी गलती उनके विरोधियों को कम आकंना जबकि उनके विरोधियों ने चरमपंथी रवैया अपनाया था जिन्होंने उनकी हार को जन्म दिया. उन्होंने अपनी गलतियों से सिखा और गेंदबाज़ी और क्षेत्ररक्षण में बेहतरीन प्रदर्शन किया और अतिरिक्त रन देने से भी बचें. इसलिए यह सभी उम्मीदवारो के लिए बेहद आवश्यक बिंदु है, उन्हें किसी भी विषय को हल्के में नहीं लेना चाहिए और अपने विरोधी अर्थात परीक्षा को हलके में नहीं लेना चाहिए और और अपने कमजोर पक्ष को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए. अगर भारतीय टीम अपने कमजोर पक्ष पर ध्यान केन्द्रित करती तो आज परिणाम दूसरे होते. अनुशासन किसी भी खेल को जितने का सबसे पहला कदम है. यह केवल भारतीय टीम के लिए ही नहीं बल्कि आपके लिए भी आवश्यक है. अनुशासन किसी भी लड़ाई में जीत की कुंजी है, यह जीवन की बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को वश में करने सबसे पहला नियम है. तो विजेताओ अपनी कमर कस लो और रेस के लिए तैयार हो जाओ क्योकि यह रेस बहुत कठिन है और आपके साथ बहुत से उम्मीदवार प्रतिस्पर्धा करने वाले है और आपको उन सभी को पीछे छोड़ना है. मूल यह है कि आप जब जागेंगे तभी सवेरा है और विजेता आपके भीतर ही छिपा है.



PS: हार स्वीकार करना बहुत कठिन है परन्तु हमे वो गौरवान्वित पल नहीं भूलने चाहिए जो हमे हमारी टीम ने दिए. कपिल देव से शुरुआत करें तो उन्होंने 1983 में विश्व कप जीता था और हाल में भी ऐसे बहुत से पल हमारी टीम ने हमे दिए जिस पर हम गर्व कर सकते है. हम अभी भी अपनी टीम के साथ है, हम अपनी टीम के साथ हर उतार-चढाव में है, इंडिया हमेशा ही दुनिया की सर्वश्रेष्ट टीम है और रहेगी.




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